गांधीजी पर कविता गांधीजी पर निबंध हिंदी मैं,गांधीजी के दस उपयोगी सिदांत

Gandhiji Kavita Essay in Hindi Gandhiji 10 Useful Principals

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गाँधीजी का जीवन परिचय –

महत्मा गाँधी भारत के राष्ट्रपिता के रूप मैं जाने जाते हैं | बापू महत्मा गाँधी ने भारत के लोगों के लिए,उनकी भलाई के लिए अपने सम्पूर्ण जीवन का त्याग किया | भारत की आजादी के लिय अनेको रेलिया निकाली,लोगों को एकजुट किया,सत्याग्रह किये गये और कई बार जेल भी गए | इस प्रकार गांधीजी ने अनेको भारत के हित के लिए काम किये जिसके लिए युगों युगों तक उन्हें बापू के नाम से जाना जायेगा |मोहनदास करमचन्द गांधी भारत एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे। वे सत्याग्रह के माध्यम से अत्याचार के प्रतिकार के अग्रणी नेता थे, उनकी इस अवधारणा की नींव सम्पूर्ण अहिंसा के सिद्धान्त पर रखी गयी थी जिसने भारत को आजादी दिलाकर पूरी दुनिया में जनता के नागरिक अधिकारों एवं स्वतन्त्रता के प्रति आन्दोलन के लिये प्रेरित किया। उन्हें दुनिया में आम जनता महात्मा गांधी के नाम से जानती है।

नागार्जुन रचित गांधी जी पर कविता : Hindi Kavita on Gandhiji

बापू महान, बापू महान!
ओ परम तपस्वी परम वीर
ओ सुकृति शिरोमणि, ओ सुधीर
कुर्बान हुए तुम, सुलभ हुआ
सारी दुनिया को ज्ञान
बापू महान, बापू महान!!
बापू महान, बापू महान
हे सत्य-अहिंसा के प्रतीक
हे प्रश्नों के उत्तर सटीक
हे युगनिर्माता, युगाधार
आतंकित तुमसे पाप-पुंज
आलोकित तुमसे जग जहान!
बापू महान, बापू महान!!
दो चरणोंवाले कोटि चरण
दो हाथोंवाले कोटि हाथ
तुम युग-निर्माता, युगाधार
रच गए कई युग एक साथ ।
तुम ग्रामात्मा, तुम ग्राम प्राण
तुम ग्राम हृदय, तुम ग्राम दृष्टि
तुम कठिन साधना के प्रतीक
तुमसे दीपित है सकल सृष्टि ।

महात्मा गाँधी के सुविचार : Best Inspirational Mahatma Gandhi Quotes in Hindi

1.खुशियाँ तभी हैं जब आप जो सोचते हैं, जो कहते हैं और जो करते हैं, सामंजस्य में हों।

2.आपको इंसानियत पर कभी भी भरोसा नहीं तोडना चाहिए क्योंकि इस दुनिया में इंसानियत एक ऐसा समुद्र है जहाँ अगर कुछ बूँदें गंदी हो भी जाएँ तो भी समुद्र गंदा।

3.कुछ ऐसा जीवन जियो जैसे की तुम कल मरने वाले हो, कुछ ऐसा सीखो जिससे कि तुम हमेशा के जीने वाले हो।

4.एक आँख के बदले आँख ही पूरी दुनिया को अँधा बना कर समाप्त होता है।

5.पहले वह आपकी उपेक्षा करेंगे, उसके बाद आपपे हसंगे, उसके बाद आपसे लड़ाई करेंगे, उसके बाद आप जीत जायेंगे।

6.जब में सूर्यास्त और चन्द्रमा के सौंदर्य की प्रसंशा करता हूँ, मेरी आत्मा इसके निर्माता के पूजा के लिए विस्तृत हो उठती है।

7.जहाँ प्रेम है वहीँ जीवन है।

8.हो सकता है हम ठोकर खाकर गिर पड़ें पर हम उठ सकते हैं; लड़ाई से भागने से तो इतना अच्छा ही है।

9.एक देश की संस्कृति दिलों में और अपने लोगों की आत्मा में रहता है। – महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi)

10. Live as if you were to die tomorrow. Learn as if you were to live forever

गांधीजी के सिदांत : The Principals of Gandhiji

सत्य :

गांधी जी ने अपना जीवन सत्य, या सच्चाई की व्यापक खोज में समर्पित कर दिया। उन्होंने इस लक्ष्य को प्राप्त करने करने के लिए अपनी स्वयं की गल्तियों और खुद पर प्रयोग करते हुए सीखने की कोशिश की। उन्होंने अपनी आत्मकथा को सत्य के प्रयोग का नाम दिया।गांधी जी ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ने के लिए अपने दुष्टात्माओं , भय और असुरक्षा जैसे तत्वों पर विजय पाना है। .गांधी जी ने अपने विचारों को सबसे पहले उस समय संक्षेप में व्य‍क्त किया जब उन्होंने कहा भगवान ही सत्य है बाद में उन्होने अपने इस कथन को सत्य ही भगवान है में बदल दिया। इस प्रकार , सत्य में गांधी के दर्शन है

अहिंसा

गांधी जी अहिंसा के सिद्धांत के प्रवर्तक बिल्कुल नहीं थे फिर भी इसे बड़े पैमाने पर राजनैतिक क्षेत्र में इस्तेमाल करने वाले वे पहले व्यक्ति थे। अहिंसा , और अप्रतिकार का भारतीय धार्मिक विचारों में एक लंबा इतिहास है और इसके हिंदु, बौद्ध, जैन, यहूदी और ईसाई समुदायों में बहुत सी अवधारणाएं हैं। गांधी जी ने अपनी आत्मकथा द स्टोरी ऑफ़ माय एक्सपेरिमेंट्स विथ ट्रुथ ” (The Story of My Experiments with Truth)में दर्शन और अपने जीवन के मार्ग का वर्णन किया है। उन्हें कहते हुए बताया गया था जब मैं निराश होता हूं तब मैं याद करता हूं कि हालांकि इतिहास सत्य का मार्ग होता है किंतु प्रेम इसे सदैव जीत लेता है। यहां अत्याचारी और हतयारे भी हुए हैं और कुछ समय के लिए वे अपराजय लगते थे किंतु अंत में उनका पतन ही होता है -इसका सदैव विचार करें।

” मृतकों, अनाथ तथा बेघरों के लिए इससे क्या फर्क पड़ता है कि स्वतंत्रता और लोकतंत्र के पवित्र नाम के नीचे संपूर्णवाद का पागल विनाश छिपा है।
एक आंख के लिए दूसरी आंख पूरी दुनिया को अंधा बना देगी।
मरने के लिए मैरे पास बहुत से कारण है किंतु मेरे पास किसी को मारने का कोई भी कारण नहीं है।

इन सिद्धातों को लागू करने में गांधी जी ने इन्हें दुनिया को दिखाने के लिए सर्वाधिक तार्किक सीमा पर ले जाने से भी मुंह नहीं मोड़ा जहां सरकार, पुलिस और सेनाए भी अहिंसात्मक बन गईं थीं।

शाकाहारी :

बाल्यावस्था में गांधी को मांस खाने का अनुभव मिला। ऐसा उनकी उत्तराधिकारी जिज्ञासा के कारण ही था जिसमें उसके उत्साहवर्धक मित्र शेख मेहताब का भी योगदान था। वेजीटेरियनिज्म का विचार भारत की हिंदु और जैन प्रथाओं में कूट-कूट कर भरा हुआ था तथा उनकी मातृभूमि गुजरात में ज्यादातर हिंदु शाकाहारी ही थे। इसी तरह जैन भी थे। गांधी का परिवार भी इससे अछूता नहीं था। पढाई के लिए लंदन आने से पूर्व गांधी जी ने अपनी माता पुतलीबाई और अपने चाचा बेचारजी स्वामी से एक वायदा किया था कि वे मांस खाने, शराब पीने से तथा संकीणता से दूर रहेंगे। उन्होने अपने वायदे रखने के लिए उपवास किए और ऐसा करने से सबूत कुछ ऐसा मिला जो भोजन करने से नहीं मिल सकता था, उन्होंने अपने जीवन पर्यन्त दर्शन के लिए आधार जो प्राप्त कर लिया था। जैसे जैसे गांधी जी व्यस्क होते गए वे पूर्णतया शाकाहारी बन गए। उन्होंने द मोरल बेसिस ऑफ वेजीटेरियनिज्म तथा इस विषय पर बहुत सी लेख भी लिखें हैं जिनमें से कुछ लंदन वेजीटेरियन सोसायटी के प्रकाशन द वेजीटेरियन में प्रकाशित भी हुए हैं। गांधी जी स्वयं इस अवधि में बहुत सी महान विभूतियों से प्रेरित हुए और लंदन वेजीटेरियन सोसायटी के चैयरमेन डॉ० जोसिया ओल्डफील्ड के मित्र बन गए।

ब्रह्मचर्य :

जब गाँधी जी सोलह साल के हुए तब उनके पिताश्री की तबियत बहुत ख़राब थी उनके पिता की बीमारी के दौरान वे हमेशा उपस्थित रहते थे क्योंकि वे अपने माता-पिता के प्रति अत्यंत समर्पित थे. यद्यपि, गाँधी जी को कुछ समय की राहत देने के लिए एक दिन उनके चाचा जी आए वे आराम के लिए शयनकक्ष पहुंचे जहाँ उनकी शारीरिक अभिलाषाएं जागृत हुई और उन्होंने अपनी पत्नी से प्रेम किया नौकर के जाने के पश्चात् थोडी ही देर में ख़बर आई की गाँधी के पिता का अभी अभी देहांत हो गया है.गाँधी जी को जबरदस्त अपराध महसूस हुआ और इसके लिए वे अपने आप को कभी माफ नहीं कर सकते थे उन्होंने इस घटना का जिक्र दोहरी शर्म में किया इस घटना का गाँधी पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा और वे ३६ वर्ष की उम्र में ब्रह्मचर्य (celibate) की और मुड़ने लगे, जबकि उनकी शादी हो चुकी थी |

सादगी :

गाँधी जी का मानना था कि अगर एक व्यक्ति समाज सेवा में कार्यरत है तो उसे साधारण जीवन की और ही बढ़ना चाहिए जिसे वे ब्रह्मचर्य के लिए आवश्यक मानते थे. उनकी सादगी ने पश्चमी जीवन शैली को त्यागने पर मजबूर करने लगा और वे दक्षिण अफ्रीका में फैलने लगे थे इसे वे “ख़ुद को शुन्य के स्थिति में लाना” कहते हैं जिसमे अनावश्यक खर्च, साधारण जीवन शैली को अपनाना और अपने वस्त्र स्वयं धोना आवश्यक है.[11]एक अवसर पर जन्मदार की और से सम्मुदय के लिए उनकी अनवरत सेवा के लिए प्रदान किए गए उपहार को भी वापस कर देते हैं.

विश्वास

गाँधी का जन्म हिंदू धर्म में हुआ, उनके पुरे जीवन में अधिकतर सिधान्तों की उत्पति हिंदुत्व से हुआ. साधारण हिंदू कि तरह वे सारे धर्मों को समान रूप से मानते थे, और सारे प्रयासों जो उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए कोशिश किए जा रहे थे उसे अस्वीकार किया. वे ब्रह्मज्ञान के जानकार थे और सभी प्रमुख धर्मो को विस्तार से पढ़तें थे. उन्होंने हिंदू धर्म के बारे में निम्नलिखित कहा है.

हिंदू धर्म के बारें में जितना मैं जानता हूँ यह मेरी आत्मा को संतुष्ट करती है, और सारी कमियों को पूरा करती है जब मुझे संदेह घेर लेती है, जब निराशा मुझे घूरने लगती है, और जब मुझे आशा की कोई किरण नजर नही आती है, तब मैं भगवद् गीता को पढ़ लेता हूँ और तब मेरे मन को असीम शान्ति मिलती है और तुंरत ही मेरे चेहरे से निराशा के बादल छंट जातें हैं और मैं खुश हो जाता हूँ.मेरा पुरा जीवन त्रासदियों से भरा है और यदि वो दृश्यात्मक और अमिट प्रभाव मुझ पर नही छोड़ता, मैं इसके लिए भगवत गीता के उपदेशों का ऋणी हूँ.

गांधी जी पर निबंध : Gandhi ji essay in Hindi

महात्मा गाँधी का जन्म 2 अक्टूबर सन् 1869 ई. को गुजरात राज्य के काठियावाड़ जिलान्तर्गत पोरबन्दर में हुआ था। आपकी माता श्री पुतलीबाई और पिता श्री कर्मचन्द्र गाँधी जी थे। आपके बचपन का नाम मोहनदास था। आपके पिता श्री राजकोट रियासत के दीवान थे। राजकोट में ही रहकर गाँधी जी ने हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। आपके बालक मन पर माता के हिन्दू आदर्श की छाप और पिताश्री के सिद्धांतवादी विचारों की गम्भीर छाप पड़ चुकी थी। इसीलिए उच्च शिक्षा को प्राप्त करने के लिए जब आप इंग्लैण्ड जाने लगे, तब माताश्री को यह विश्वास दिलाया था कि वे मांस-शराब को नहीं स्पर्श करेंगे और यही हुआ भी। आपने इंग्लैण्ड में लगभग तीन वर्षों में वकालत की शिक्षा पूरी कर ली। वैरिस्ट्री की शिक्षा प्राप्त करके श्री गाँधी पुनः स्वदेश लौट आए।

स्वदेश आकर गाँधी जी ने बम्बई में वकालत शुरू कर दी। एक मुकदमे की पैरवी करने के लिए आपको दक्षिणी अफ्रीका जाना पड़ा। मार्ग में गाँधी जी के साथ अंग्रेजों ने दुर्व्यवहार किया। दक्षिणी अफ्रीका में इन्होंने भारतीयों के प्रति गोरे शासकों की अमानवता और हदयहीनता देखी। इनका मन क्षुब्ध हो उठा। ये अंग्रेजों के इस अनुचित और हदय पर चोट पहुँचाने वाले व्यवहार से क्रोधित हो उठे। सन् 1906 ई. में जब ट्रांसवाल कानून पारित हुआ। तब गाँधी जी ने इसका विरोध किया। इसके लिए गाँधी जी ने सत्याग्रह आन्दोलन को जारी किया और अनेक पीडि़त तथा शोषित भारतीयों को इससे प्रभावित करते हुए उनकी स्वतंत्रता की चेतना को जगाया। इसी सिलसिले में गाँधी जी ने कांग्रेस की स्थापना भी की। लगातार दो वर्षों की सफलता के बाद गाँधी जी भारत लौट आए।

सन् 1915 ई. में जब श्री गाँधी दक्षिणी अफ्रीका से स्वदेश लौट आए, तो यहाँ भी इन्होंने अंग्रेजों के अत्याचारों और कठोरता का गहरा अध्ययन करके भारतीयों की स्वतंत्रता के प्रयास आरम्भ कर दिए। गाँधी जी ने भारत की समस्त जनता को स्वतंत्रता के लिए आहान किया। अब वे अंग्रेज सरकार से टक्कर लेने को पूर्ण रूप से तैयार हो गए। गाँधी ने सन् 1919 में असहयोग आन्दोलन का नेतृत्व करते हुए देशव्यापी स्तर पर स्वतंत्रता प्राप्ति का बिगुल बजा दिया। सन् 1918 ई. में अंग्रेज सरकार को अपनी नीतियों में सुधार करना पड़ा, लेकिन श्री गाँधी इससे संतुष्ट नहीं हुए। फलतः श्री गाँधी जी ने पूर्ण स्वतंत्रता के प्रयास में जी जान के साथ भाग दौड़ शुरू कर दी। इस समय देश के हरेक कोने से एक से एक बढ़कर देशभक्तों ने जन्मभूमि भारत की गुलामी की बेड़ी को तोड़ने को कमर कसकर महात्मा गाँधी का साथ देना शुरू कर दिया था। इनमें बालगंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, लाला लाजपतराय, सुभाषचन्द्र बोस आदि मुख्य रूप से थे। इसी समय सन् 1929 ई. में अंग्रेजों से पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की गई। कोई प्रभाव न पड़ने के कारण महान नेताओं सहित महात्मा गाँधी ने नमक कानून तोड़ डाला। महात्मा गाँधी सहित अनेक व्यक्तियों को जेल जाना पड़ा। इससे कुछ सहमी अंग्रेज सत्ता को समझौता करना पड़ा था। सन् 1931 ई. में वायसराय ने लंदन में गोलमेज में कांग्रेस से बातचीत की, लेकिन कोई अपेक्षित परिणान न निकला।

सन् 1934 ई. में अंग्रेजों ने अपनी मूल नीतियों में कुछ सुधार किया और इसकी घोषणा भी की। फिर भी अंग्रेजों का जुल्म भारतीयों पर वैसे ही चलता रहा। इससे क्षुब्ध होकर महात्मा गाँधी ने सन् 1942 ई. में भारत छोड़ो का अभूतपूर्व नारा लगाया। चारों ओर से आजादी का स्वर फूट पड़ा। सम्सत वातावरण केवल आजादी की ध्वनि करता था। अंग्रेज सरकार के पाँव उखड़ने लगे। अनेक महान नेताओं सहित सभी कर्मठ और देश की आन पर मिटने वाले राष्ट्र भक्तों से जेल भर गए। इतनी भारी संख्या में कभी कोई आन्दोलन नहीं हुआ था। अंग्रेज सरकार ने जब अपने शासन के दिन को लदते हुए देखा, तो अंततः 15 अगस्त, 1947 ई. को भारत को पूर्ण स्वतंत्रता सौंप दी।

स्वतंत्रता के बाद भारत चंद समय तक स्वस्थ रहा। फिर समय के कुछ देर के बाद इसमें साम्प्रदायिकता का ऐसा रोग लग गया कि इसकी शल्प चिकित्सा करने पर भारत और पाकिस्तान दो विभिन्न अंग सामने आ गए। महात्मा गाँधी का अन्तःकरण रो उठा। वह अब यथाशीघ्र मृत्यु की गोद में जाना चाहते थे। महात्मा जी की इस छटपटाहट को समय ने स्वीकार कर लिया। वे 30 जनवरी सन् 1948 ई. को एक अविवेकी भारतीय नाथूराम गोडसे की गोलियों के शिकार बनकर चिरनिद्रा की गोद में चले गए।

महात्मा गांधी की कुछ अनमोल बातें

1. माफ़ करना सीखो

2. सफ़लता के लिए अभ्यास ज़रूरी है

3. समाज को बदलने से पहले खुद को बदलो

4. अपने विश्वास को मरने मत दो

5. सभी धर्मों की इज़्ज़त करो

6. पापी से प्रेम करो

7. हमेशा सत्य की राह पर चलो

8. लोगों के कपड़ों को नहीं उनके चरित्र को देखो

9. मौन अपनाओ

10. इस संदेश को अपने जीवन में उतारो

11. ये अनुमति आप किसे देते हैं, ये आप पर निर्भर करता है

12. अपने विचारों को कुरीतियों से ऊपर उठाओ

13. किसी भी काम को करने से पहले उसके बारे में सोचो

14. अपने क्रोध पर विजय पाओ

15. कायरता छोड़ो

महात्मा गांधी की तस्वीर लगाने या उन्हें सिर्फ़ 2 अक्टूबर के दिन याद करने की जगह उनके इन विचारों को अपने जीवन में उतारिए और इन्हें अपने दोस्तों के साथ भी शेयर कीजिए. शायद तभी आप जान पाएंगे की बापू के सपनों का भारत कैसा था!

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