दीपावली से जुड़े पंचपर्व का महत्व पूजन विधि और कथा

दीपावली से जुड़े पंचपर्व का महत्व पूजन विधि और कथा

 दीपावली से जुड़े पंचपर्व का महत्व पूजन विधि और कथा

दीपावली से जुड़े पंचपर्व का महत्व पूजन विधि और कथा

दीपावली पर्व भारतीय सभ्यता की एक अनोखी छठा को पेश करता है दीपावली के कई दिन पहले से ही माँ लक्ष्मीजी के स्वागत तैयारियाँ शुरू कर दी जाती है दुकानों पर मिठाईयो की खुशबु आने लगती है वस्त्रो और बर्तनों की दुकानों पर अच्छी-खासी भीड़ देखने को मिलती है और यही नजारा गहनों (जेवर)की दुकनो पर भी देखने को मिलता है दूर रहने वाले लोग अपने व्यपार से छुट्टी लेकर अपने परिवार के साथ दीपावली मनाने के लिए घर आते है आनन्द ,खुशी और मस्ती का त्योहार दीपक और पटाके जलाकर बड़ी धूमधाम से मनाते है शायद इसीलिए आज पटाखों के शोर में माता लक्ष्मी की आरती का गुणगान अवश्य ही कम हो गया है लेकिन इसके पीछे की मूल भावना आज भी वैसी की वैसी बनी हुई है।

हिन्‍दु धर्म में दीपावली का महत्व

 दीवाली से संबंधित कविताओं का एक संग्रह

दीपावली प्रकाश का त्यौहार हैं जो यह सीख देता हैं कि व्यक्ति के जीवन में सुख दुःख सदैव आता-जाता रहता है। इसलिए मनुष्य को वक्त की दिशा में आगे बढ़ते रहना चाहिए। न दुःख से टूटना चाहिए और ना ही सुख का घमंड करना चाहिए। दिवाली का महत्व ही यही हैं जो उसकी पौराणिक कथाओं में छिपा हुआ हैं कैसे भगवान का स्वरूप होते हुए भी राम, लक्ष्मण एवम सीता को जीवन में कष्ट सहना पड़ा।माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे। अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से उल्लसित था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाए। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं।इस दिन मूल रूप से लक्ष्मीपूजन के साथ गणेश भगवान कि पूजा-आराधना व स्‍तूति की जाती है। भारतीय नव वर्ष की शुरूआत इसी दिन से मानी जाती है दिपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। इसलिए दीपावली से कई दिनों पूर्व ही इसकी तैयारियाँ शुरू हो जाती है। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का काम शुरू कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफ़ेदी आदि का कार्य होने लगता हैं। लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा कर सजाते हैं। बाज़ारों और गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दिपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाज़ार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं। लोग अपने घरो को सुन्‍दर रूप से सजाने के बाद उसमे रोशनी करते हैं क्‍योंकि दिवाली को अँधेरे से रोशनी में जाने का प्रतीक माना जाता है।इसलिए भारतीय व्यापारी बन्‍धु अपने नए लेखाशास्‍त्र यानी नये बही-खाते इसी दिन से प्रारम्भ करते हैं और अपनी दुकानों, फैक्ट्री, दफ़्तर आदि में भी लक्ष्मी-पूजन का आयोजन करते हैं हिन्दू मान्यतानुसार अमावस्या की रात्रि में लक्ष्मी जी धरती पर भ्रमण करती हैं और लोगों को वैभव का आशीष देती है। दीपावली के दिन गणेश जी की पूजा का यूं तो कोई उल्लेख नहीं परंतु उनकी पूजा के बिना हर पूजा अधूरी मानी जाती है। इसलिए लक्ष्मी जी के साथ विघ्नहर्ता श्री गणेश जी की भी पूजा की जाती है।
दिपावली के दिन दीपदान का विशेष महत्त्व होता है। नारदपुराण के अनुसार इस दिन मंदिर, घर, नदी, बगीचा, वृक्ष, गौशाला तथा बाजार में दीपदान देना शुभ माना जाता है।

हिन्‍दु धर्म में दीपावली को पंच पर्वो का त्‍योहार कहा जाता है जो इस प्रकार है

धनतेरस, नरक चतुर्थी(छोटी दिवाली), दिपावली,गोरधन पूजा और भैया दूज सम्मिलित हैं। दिपावली के त्‍यौहार को पूर्ण उत्‍साह के साथ मनाते हैं क्‍योकि इस त्‍यौहार का न केवल धार्मि‍क महत्‍व है बल्कि व्‍यापारिक महत्‍व भी है।

हिन्‍दु धर्म में धनतेरश का महत्व

इस पर्व पर लोग अपने घरों में यथासम्‍भव सोने का सामान खरीदकर लाते हैं और मान्‍यता ये होती है कि इस दिन सोना खरीदने से उसमें काफी वृद्धि होती है। इस दिन जो सामान घर पर लाते है उसकी पूजा भी की जाती है लेकिन आज के दिन का अपना अलग ही महत्‍व है क्‍योंकि आज के दिन ही भगवान धनवन्‍तरी का जन्‍म हुआ था जो कि समुन्‍द्र मंथन के दौरान अपने साथ अमृत का कलश व आयुर्वेद लेकर प्रकट हुए थे और इसी कारण से भगवान धनवन्‍तरी को औषधी का जनक भी कहा जाता है।

हिन्‍दु धर्म में नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) —

नरक चतुर्दशी को छोटी दिपावली भी कहा जाता है क्‍योंकि ये (छोटी दिवाली)दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाती है और इस दिन मूल रूप से यम पूजा हेतु दीपक जलाए जाते हैं, जिसे दीप दान कहा जाता है।मान्‍यता ये है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था। इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाए। एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विंष्णु ने इसी दिन नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था।

हिन्‍दु धर्म में दीपावली का महत्व

दीपावली के दिन सभी घरों में लक्ष्मी-गणेश जी की पूजा की जाती है और हिन्दू मान्यतानुसार अमावस्या की इस रात्रि में लक्ष्मी जी धरती पर भ्रमण करती हैं तथा लोगों को वैभव की आशीष देती है।दिपावली के दिन यद्धपि गणेश जी की पूजा का कोई विशेष विधान नहीं है लेकिन क्‍योंकि भगवान गणपति प्रथम पूजनीय हैं, इसलिए सर्वप्रथम पंच विधि से उनकी पूजा-आराधना करने के बाद माता लक्ष्‍मी जी की षोड़श (सोलह)विधि से पूजा-अर्चना की जाती है। हिन्‍दु धर्म में मान्यता है कि इस दिन यदि कोई श्रद्धापूर्वक मां लक्ष्मी की पूजा करता है, तो उसके घर कभी धन-धान्‍य कि कमी नहीं होती है यह मान्यता उस समय से है जब भगवान श्री राम चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके आये तो अयोध्या वासियों ने घी के दीपक जलाये थे |

हिन्‍दु धर्म में गोवर्धन पूजा का महत्व

दीपावली के अगले दिन भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर भगवान इन्द्र को पराजित कर उनके गर्व का नाश किया था तथा गोवर्धन पर्वत की पूजा-अर्चना कर गायों का पूजन किया था। इसलिए दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन की पूजा-अर्चना करते हुए भगवान कृष्‍ण को याद किया जाता है।

भाईदूज का परम महत्व

दिपावली के तीसरे दिन “भाईदूज” का त्यौहार मनाया जाता है और इस दिन बहन अपने भाई के मस्तक पर तिलक लगाकर उसकी सलामती की प्रार्थना करती हैं। यह त्यौहार उत्तर भारत के साथ पुरे भारत में भी बड़ी आस्था से मनाया जाता है तथा इस त्यौहार को “यम द्वितीया” के नाम से भी जाना जाता है।
कहा जाता है कि यम ने यमुना नदी को इसी दिन अपनी बहन कहा था और यमुना देवी ने इसी दिन यम को तिलक लगा कर यम का पूजन किया था।

दीपावली का शुभ मुहर्त और पूजन विधि

दीपावली का शुभ मुहर्त 30 अक्टूबर 2016 को कार्तिक अमावस को रखा गया है ।सर्वप्रथम चौकी पर लक्ष्मी व गणेश की मूर्तियां इस प्रकार रखें कि उनका मुख पूर्व या पश्चिम में रहे। लक्ष्मीजी, गणेशजी की दाहिनी ओर रहें। पूजनकर्ता मूर्तियों के सामने की तरफ बैठें। कलश को लक्ष्मीजी के पास चावलों पर रखें। नारियल को लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटें कि नारियल का अग्रभाग दिखाई देता रहे व इसे कलश पर रखें। यह कलश वरुण का प्रतीक माना गया है।दो बड़े दीपक रखें। एक में घी भरें व दूसरे में तेल। एक दीपक चौकी के दाईं ओर रखें व दूसरा मूर्तियों के चरणों में। इसके अतिरिक्त एक दीपक गणेशजी के पास रखें।मूर्तियों वाली चौकी के सामने छोटी चौकी रखकर उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। कलश की ओर एक मुट्ठी चावल से लाल वस्त्र पर नवग्रह की प्रतीक नौ ढेरियां बनाएं। गणेशजी की ओर चावल की सोलह ढेरियां बनाएं। ये सोलह मातृका की प्रतीक हैं। नवग्रह व षोडश मातृका के बीच स्वस्तिक का चिह्न बनाएं।इसके बीच में सुपारी रखें व चारों कोनों पर चावल की ढेरी। सबसे ऊपर बीचोंबीच ॐ लिखें। छोटी चौकी के सामने तीन थाली व जल भरकर कलश रखें। थालियों की निम्नानुसार व्यवस्था करें- 1. ग्यारह दीपक, 2. खील, बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चन्दन का लेप, सिन्दूर, कुंकुम, सुपारी, पान, 3. फूल, दुर्वा, चावल, लौंग, इलायची, केसर-कपूर, हल्दी-चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक।इन थालियों के सामने यजमान बैठे। आपके परिवार के सदस्य आपकी बाईं ओर बैठें। कोई आगंतुक हो तो वह आपके या आपके परिवार के सदस्यों के पीछे बैठे।विधिवत-पूजन करने के बाद घी का दीपक जलाकर महालक्ष्मी जी की आरती की जाती है. आरती के लिए एक थाली में रोली से स्वास्तिक बनाएं. उस में कुछ अक्षत और पुष्प डालें, गाय के घी का चार मुखी दीपक चलायें. और मां लक्ष्मी की शंख, घंटी, डमरू आदि से आरती उतारें.आरती करते समय परिवार के सभी सदस्य एक साथ होने चाहिए. परिवार के प्रत्येक सदस्य को माता लक्ष्मी के सामने सात बार आरती घूमानी चाहिए. सात बात होने के बाद आरती की थाली को लाइन में खड़े परिवार के अगले सदस्य को दे देना चाहिए. यहीं क्रिया सभी सदस्यों को करनी चाहिए.दीपावली पर सरस्वती पूजन करने का भी विधान है. इसके लिए लक्ष्मी पूजन करने के पश्चात मां सरस्वती का भी पूजन करना चाहिए।दीपावली एवं धनत्रयोदशी पर महालक्ष्मी के पूजन के साथ-साथ धनाध्यक्ष कुबेर का पूजन भी किया जाता है. कुबेर पूजन करने से घर में स्थायी सम्पत्ति में वृद्धि होती है और धन का अभाव दूर होता है.

लक्ष्मी जी के व्रत की कथा

एक गांव में एक साहूकार था, उसकी बेटी प्रतिदिन पीपल पर जल चढ़ाने जाती थी जिस पीपल के पेड़ पर वह जल चढ़ाती थी, उस पेड़ पर लक्ष्मी जी का वास था। एक दिन लक्ष्मी जी ने साहूकार की बेटी से कहा ‘मैं तुम्हारी सहेली बनना चाहती हूँ लड़की ने कहा की ‘मैं अपने पिता से पूछ कर आऊगी । यह बात उसने अपने पिता को बताई, तो पिता ने ‘हां’ कर दी. दूसरे दिन से साहूकार की बेटी ने लक्ष्मीजी से सहेली बनना स्वीकार कर लिया।
दोनों अच्छे मित्रों की तरह आपस में बातचीत करने लगे. एक दिन लक्ष्मीजी साहूकार की बेटी को अपने घर ले गई. अपने घर में लक्ष्मी जी ने उसका बहुत अच्छे से स्वागत किया । उसे अनेक प्रकार के भोजन परोसे. मेहमान नवाजी के बाद जब साहूकार की बेटी लौटने लगी तो, लक्ष्मी जी ने प्रश्न किया कि अब तुम मुझे अपने घर कब बुलाओगी ! साहूकार की बेटी ने लक्ष्मी जी को अपने घर आने का न्योता तो दे लिया, परन्तु अपने घर की आर्थिक स्थिति देख कर वह उदास हो गई।
साहूकार ने अपनी बेटी को उदास देखा तो वह समझ गया, उसने अपनी बेटी को समझाया, कि तू मिट्टी से चौका लगा कर घर में साफ-सफाई कर चोमुखा दीपक जला कर और लक्ष्मी जी का नाम लेकर बैठ जाना । उसी समय एक चील किसी रानी का नौलखा हार लेकर उड़ थी जो की साहूकार की बेटी की गोद में गिर गया । साहूकार की बेटी ने उस हार को बेचकर भोजन की तैयारी की थोड़ी देर में श्री गणेश के साथ लक्ष्मी जी उसके घर आ गई साहूकार की बेटी ने दोनों की खूब सेवा की तो लक्ष्मी जी बहुत प्रसन्न हुई और साहूकार की बेटी को कहा में तुमसे बहुत खुश हु तुम मुझसे क्या चाहती हो में तुम्हे एक वरदान देना चाहतीं हू साहूकार की बेटी ने लक्ष्मी जी के लिये चोकी रख दी और कहा जब तक में यहाँ वापस नही आती आप यहाँ से उठाना मत इसके बाद साहूकार की बेटी की बाहर चली गई और अन्दर नही आई और लक्ष्मी जी उस चोकी पर से कभी उठी नही इस प्रकार साहूकार और उसकी बेटी पर हमेशा लक्ष्मी का आशिर्वाद बना रहा हे लक्ष्मी माता जिस प्रकार साहूकार की बेटी को आशीर्वाद दिया उसी प्रकार सब पर अपना आशीर्वाद बनाये रखना ।
इस प्रकार लक्ष्मीजी के व्रत की कई कथाएँ किन्तु सब का मूल भाव एक ही है की जो कोई लक्ष्मीजी की पूजा अर्चना सच्चे मन से करता है तो लक्ष्मीजी का आशीर्वाद हमेशा अपने भक्तो पर बना रहता है ।

 

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