भाई दूज पर निबंध Bhaiya Dooj History Nibandh In Hindi

Bhaiya Dooj History nibandh In Hindi

भाई दूज पर निबंध

Bhaiya Dooj History nibandh In Hindi

Bhaiya Dooj History Nibandh In Hindi

भाई के रूप में श्री कृष्ण ने सदा द्रोपदी की सहायता की है | अतः भारत में भाई – बहन का सम्बन्ध अत्यंत महत्वपूर्ण है जो रक्षा -बंधन या भाई – दूज पर होता है | जिसमे दीवाली के बाद दूज पर बहनों द्धारा भाई को तिलक कर तथा रक्षा बंधन पर राखी बाँधते है, यह सभी विष्णुमाया की शक्ति है जो भाई की रक्षा करती है | विष्णुमाया श्री कृष्ण की बहन है और महाभारत काल में वें, ही द्रोपदी के रूप में आई थी | समय आयु एक ही सूझबूझ सुरक्षा प्रेम और पवित्रता के कारण भाई – बहन अत्यंत महत्वपूर्ण है |इस दिन बहनें भाई को अपने घर आमंत्रित कर अथवा सायं उनके घर जाकर उन्हें तिलक करती हैं और भोजन कराती हैं। ब्रजमंडल में इस दिन बहनें भाई के साथ यमुना स्नान करती हैं, जिसका विशेष महत्व बताया गया है। भाई के कल्याण और वृद्धि की इच्छा से बहने इस दिन कुछ अन्य मांगलिक विधान भी करती हैं।
यमुना तट पर भाई-बहन का समवेत भोजन कल्याणकारी माना जाता है।

भाई दूज कथा के अनुसार

भाई दूज कथा के अनुसार:-  इस दिन भगवान यमराज अपनी बहन यमुना से
मिलने जाते हैं। उन्हीं का अनुकरण करते हुए भारतीय
भ्रातृ परम्परा अपनी बहनों से मिलती है और
उनका यथेष्ट सम्मान पूजनादि कर उनसे आशीर्वाद रूप
तिलक प्राप्त कर कृतकृत्य होती हैं।
बहनों को इस दिन नित्य कृत्य से निवृत्त हो अपने
भाई के दीर्घ जीवन, कल्याण एवं उत्कर्ष हेतु तथा स्वयं
के सौभाग्य के लिए अक्षत (चावल) कुंकुमादि से
अष्टदल कमल बनाकर इस व्रत का संकल्प कर मृत्यु के
देवता यमराज की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए।
इसके पश्चात यमभगिनी यमुना, चित्रगुप्त और
यमदूतों की पूजा करनी चाहिए। तदंतर भाई के तिलक
लगाकर भोजन कराना चाहिए।

भैयादूज कथा Bhai Dooj Katha In Hindi

भैयादूज कथा:-  सूर्य की संज्ञा से दो संतानें थीं- पुत्र यमराज
तथा पुत्री यमुना। संज्ञा सूर्य का तेज सहन न कर
पाने के कारण अपनी छायामूर्ति का निर्माण कर
उसे ही अपने पुत्र-पुत्री को सौंपकर वहां से चली गई।
छाया को यम और यमुना से किसी प्रकार
का लगाव न था, किंतु यम और यमुना में बहुत प्रेम था।
यमुना अपने भाई यमराज के यहां प्रायः जाती और
उनके सुख-दुख की बातें पूछा करती। यमुना यमराज
को अपने घर पर आने के लिए कहती, किंतु
व्यस्तता तथा दायित्व बोझ के कारण वे उसके घर न
जा पाते थे।
एक बार कार्तिक शुक्ल द्वितीय को यमराज
अपनी बहन यमुना के घर अचानक जा पहुंचे। बहन
यमुना ने अपने सहोदर भाई को बड़ा आदर-सत्कार
किया। विविध व्यंजन बनाकर उन्हें भोजन
कराया तथा भाल पर तिलक लगाया। यमराज
अपनी बहन से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने
यमुना को विधिव भेंट समर्पित की। जब वे वहां से
चलने लगे, तब उन्होंने यमुना से कोई भी मनोवांछित वर
मांगने का अनुरोध किया।
यमुना ने उनके आग्रह को देखकर कहा- भैया! यदि आप
मुझे वर देना ही चाहते हैं तो यही वर दीजिए कि आज
के दिन प्रतिवर्ष आप मेरे यहां आया करेंगे और
मेरा आतिथ्य स्वीकार किया करेंगे।
इसी प्रकार जो भाई अपनी बहन के घर जाकर
उसका आतिथ्य स्वीकार करे तथा उसे भेंट दें, उसकी सब
अभिलाषाएं आप पूर्ण किया करें एवं उसे आपका भय न
हो। यमुना की प्रार्थना को यमराज ने स्वीकार कर
लिया। तभी से बहन-भाई का यह त्योहार
मनाया जाने लगा।
वस्तुतः-  इस त्योहार का मुख्य उद्देश्य है भाई-बहन के
मध्य सौमनस्य और सद्भावना का पावन प्रवाह अनवरत
प्रवाहित रखना तथा एक-दूसरे के प्रति निष्कपट प्रेम
को प्रोत्साहित करना है।

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